कमरों में कैद 10 हजार बच्चों का बचपन, 105 सरकारी स्कूलों में खेल मैदान ही नहीं; कैसे खेलेंगे तो बनेंगे नवाब?

 


दमोह: नई शिक्षा नीति (NEP) में खेलों को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बताया गया है, लेकिन दमोह जिले के सरकारी स्कूलों की हकीकत इसके उलट है। जिले के 105 सरकारी स्कूलों में खेल मैदान (Playground) की सुविधा नहीं है, जिसके कारण लगभग 10 हजार बच्चों का बचपन स्कूल की चारदीवारी और बंद कमरों तक सिमट कर रह गया है।

मैदान नहीं, तो सिर्फ पढ़ाई तक सीमित रह गए बच्चे

दमोह शहर और आसपास के इलाकों में की गई पड़ताल में चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। शहर के प्रमुख स्कूल जैसे केशवराव पांडेय स्कूल, शासकीय प्राइमरी स्कूल (नया बाजार), और एनपीएस आमचौपरा सहित जिले के 59 शहरी और कुल 105 स्कूलों में खेल के लिए जगह ही नहीं है। इन स्कूलों के प्रधानाध्यापकों का कहना है कि उन्होंने पोर्टल पर जानकारी अपलोड की है और अधिकारियों को भी बताया है, लेकिन "जगह की कमी" का हवाला देकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।

मैदान न होने के 4 घातक परिणाम:

विशेषज्ञों और शिक्षकों के अनुसार, स्कूल में खेल का मैदान न होने से बच्चों के भविष्य पर बुरा असर पड़ रहा है:

  1. शारीरिक कमजोरी: शारीरिक गतिविधियों के अभाव में बच्चों की फिटनेस गिर रही है और वे कम उम्र में ही सुस्त हो रहे हैं।

  2. मानसिक तनाव: दिनभर सिर्फ कमरों में बैठकर पढ़ाई करने से बच्चों में चिड़चिड़ापन और मानसिक तनाव बढ़ रहा है।

  3. मोबाइल की लत: बाहर खेलने का विकल्प न मिलने पर बच्चे खाली समय में मोबाइल स्क्रीन की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं।

  4. प्रतिभा का दमन: मैदान न होने से बच्चों में टीमवर्क, लीडरशिप और खेल प्रतिभा सामने नहीं आ पा रही है।

केरल हाईकोर्ट की टिप्पणी और स्थानीय प्रशासन की सुस्ती

हाल ही में केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि स्कूल में खेल का मैदान बच्चों के शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास के लिए अनिवार्य है। इसके बावजूद, दमोह के स्थानीय शिक्षा विभाग के पास इन 105 स्कूलों को खेल मैदान से जोड़ने की कोई ठोस योजना नहीं है। हर साल केवल सूची बनाई जाती है, लेकिन धरातल पर कोई सुधार नहीं दिखता।

अधिकारियों की 'परवाह' पर सवाल

विदित हो कि एक तरफ सरकार 'खेलों इंडिया' जैसे अभियानों पर करोड़ों खर्च कर रही है, वहीं दूसरी तरफ दमोह के 10 हजार बच्चे बुनियादी खेल सुविधा से वंचित हैं। स्थानीय शिक्षा अधिकारियों की इस मामले में चुप्पी बच्चों के समग्र विकास (Overall Development) के लिए बड़ा खतरा बनती जा रही है।

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